श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.146.5 
अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते।
छेत्तुमप्यागते छायां नोपसंहरते द्रुम:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई शत्रु भी आपके घर आ जाए तो उसका आदर करना चाहिए। वृक्ष अपनी छाया उससे भी नहीं हटाता जो उसे काटने आया हो।'
 
‘Even if an enemy comes to your home, he should be treated with due respect. The tree does not remove its shade even from the one who has come to cut it. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)