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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग
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श्लोक 4
श्लोक
12.146.4
तद् ब्रवीतु भवान् क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि।
प्रणयेन ब्रवीमि त्वां त्वं हि न: शरणागत:॥ ४॥
अनुवाद
तो जल्दी बताओ, तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूँ? मैं तुमसे बड़े प्रेम से पूछ रहा हूँ; क्योंकि तुम हमारे घर आए हो॥4॥
‘So tell me quickly, what do you want? What service can I do for you? I am asking you with great love; because you have come to our house.॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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