एवं बहुविधं भूरि विललाप स लुब्धक:।
गर्हयन् स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथागतम्॥ २६॥
अनुवाद
कबूतर को ऐसी अवस्था में देखकर शिकारी ने बहुत विलाप किया, अपने कर्मों की निन्दा की और बहुत सी बातें कहीं।
Seeing the pigeon in such a state, the hunter lamented a lot, criticizing his own deeds and saying many things. 26.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतर और व्याधका संवादविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)