श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.146.25 
अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा।
अधर्म: सुमहान् घोरो भविष्यति न संशय:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
अरे! अपने कर्मों के कारण दण्डित हुए मुझ जैसे क्रूर शिकारी के जीवन में यह सबसे भयंकर और महान पाप होगा, इसमें संशय नहीं है॥25॥
 
Oh! This would be the most dreadful and greatest sin in the life of a cruel hunter like me, who has been condemned for my deeds, there is no doubt about it. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)