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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.146.21 
ऋषीणां देवतानां च पितॄणां च महात्मनाम्।
श्रुत: पूर्वं मया धर्मो महानतिथिपूजने॥ २१॥
 
 
अनुवाद
मैंने ऋषियों, देवताओं, पितरों और महात्माओं के मुख से सुना है कि अतिथि पूजन में महान पुण्य है।
 
'I have heard from the mouths of sages, gods, ancestors and great souls that there is a great virtue in worshipping guests. 21.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)