श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.146.20 
इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैस्तु समुज्ज्वाल्य हुताशनम्।
हर्षेण महताऽऽविष्ट: स पक्षी वाक्यमब्रवीत्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर उसने पुनः सूखे पत्तों से अग्नि प्रज्वलित की और बड़े हर्ष में भरकर शिकारी से कहा-॥20॥
 
Saying this, he again lit the fire with dry leaves and filled with great joy said to the hunter -॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)