श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 15-17h
 
 
श्लोक  12.146.15-17h 
दत्तमाहारमिच्छामि त्वया क्षुद् बाधते हि माम्।
स तद्वच: प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहङ्गम:॥ १५॥
न मेऽस्ति विभवो येन नाशयेयं क्षुधां तव।
उत्पन्नेन हि जीवामो वयं नित्यं वनौकस:॥ १६॥
संचयो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव भोजने।
 
 
अनुवाद
भाई! अब मुझे भूख लग रही है, इसलिए मैं आपका दिया हुआ कुछ खाना चाहता हूँ।' यह सुनकर कबूतर बोला - 'भाई! मेरे पास ऐसा कोई धन नहीं है जिससे मैं आपकी भूख मिटा सकूँ। हम वन के पक्षी हैं। हम प्रतिदिन जो चारा खाते हैं, उसी पर निर्वाह करते हैं। हमारे पास ऋषियों के समान अन्न का कोई भण्डार नहीं है।'॥15-16 1/2॥
 
'Brother! Now I am feeling hungry; therefore I want to eat some food given by you.' Hearing this the pigeon said - 'Brother! I do not have any wealth with which I can satisfy your hunger. We are forest birds. We survive on the fodder we eat every day. We do not have any store of food like the sages.'॥ 15-16 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)