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mahabharat 12.146.12: इस प्रकार अग्नि प्रज्वलित करके कबूतर ने शरणागत अतिथि से कहा - "भाई! अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम निश्चिंत होकर अग्नि से अपने शरीर के सब अंगों को गर्म कर सकते हो।" ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 12.146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  12.146.12 
स संदीप्तं महत् कृत्वा तमाह शरणागतम्।
प्रतापय सुविश्रब्ध: स्वगात्राण्यकुतोभय:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अग्नि प्रज्वलित करके कबूतर ने शरणागत अतिथि से कहा - "भाई! अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम निश्चिंत होकर अग्नि से अपने शरीर के सब अंगों को गर्म कर सकते हो।" ॥12॥
 
Having lit the fire in this manner, the pigeon said to the guest who had taken refuge, "Brother! Now you have nothing to fear. You can warm all your body parts with the fire without any worry." ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)