अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग
श्लोक 1: भीष्मजी कहते हैं - राजन! अपनी पत्नी की धर्मसंगत और तर्कपूर्ण सलाह सुनकर कबूतर बहुत प्रसन्न हुआ। उसकी आँखों में आनन्द के आँसू आ गए।
श्लोक 2: पक्षियों को मारकर जीविका चलाने वाले उस शिकारी को देखकर उस पक्षी ने बड़ी सावधानी से शास्त्र विधिपूर्वक उसकी पूजा की ॥2॥
श्लोक 3: और बोले, "आज आपका स्वागत है। बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? आप परेशान न हों, अभी आप अपने घर में हैं।"
श्लोक 4: तो जल्दी बताओ, तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूँ? मैं तुमसे बड़े प्रेम से पूछ रहा हूँ; क्योंकि तुम हमारे घर आए हो॥4॥
श्लोक 5: यदि कोई शत्रु भी आपके घर आ जाए तो उसका आदर करना चाहिए। वृक्ष अपनी छाया उससे भी नहीं हटाता जो उसे काटने आया हो।'
श्लोक 6: यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर आने वाले अतिथियों का उचित आदर और सत्कार करना चाहिए, तथापि यह पंच यज्ञ करने के अधिकारी गृहस्थ का प्राथमिक कर्तव्य है।
श्लोक 7: धर्म के अनुसार जो मनुष्य गृहस्थ अवस्था में रहते हुए भी पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान नहीं करता, वह न तो इस लोक को प्राप्त करता है और न ही परलोक को ॥7॥
श्लोक 8: इसलिये तू अपनी बात मुझे विश्वासपूर्वक बता, जो कुछ तू अपने मुख से कहेगी, वही मैं करूँगा; इसलिये तू मन में शोक न कर॥8॥
श्लोक 9: कबूतर की यह बात सुनकर शिकारी बोला, 'इस समय मुझे सर्दी लग रही है, इसलिए मुझे इससे बचाने के लिए कुछ करो।'
श्लोक 10: उसके ऐसा कहने पर पक्षी ने बहुत से पत्ते पृथ्वी पर रख दिए और अपने पंखों से अग्नि लाने के लिए तीव्र गति से उड़ चला॥10॥
श्लोक 11: वह लोहार के घर गया और आग ले आया तथा उसे सूखे पत्तों पर रखकर उसने आग जला दी।
श्लोक 12: इस प्रकार अग्नि प्रज्वलित करके कबूतर ने शरणागत अतिथि से कहा - "भाई! अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम निश्चिंत होकर अग्नि से अपने शरीर के सब अंगों को गर्म कर सकते हो।" ॥12॥
श्लोक 13: तब शिकारी ने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने शरीर के सभी अंगों को जला लिया। अग्नि भस्म करके उसने प्राण वापस पा लिए। फिर वह कबूतर से कुछ कहने को तैयार हुआ॥13॥
श्लोक 14: शास्त्रानुसार सम्मान पाकर उसने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कबूतर की ओर देखा और बड़े हर्ष से कहा-॥14॥
श्लोक 15-17h: भाई! अब मुझे भूख लग रही है, इसलिए मैं आपका दिया हुआ कुछ खाना चाहता हूँ।' यह सुनकर कबूतर बोला - 'भाई! मेरे पास ऐसा कोई धन नहीं है जिससे मैं आपकी भूख मिटा सकूँ। हम वन के पक्षी हैं। हम प्रतिदिन जो चारा खाते हैं, उसी पर निर्वाह करते हैं। हमारे पास ऋषियों के समान अन्न का कोई भण्डार नहीं है।'॥15-16 1/2॥
श्लोक 17-18: यह कहकर कबूतर का मुख कुछ उदास हो गया। वह चिंता करने लगा कि अब क्या करूँ। हे भरतश्रेष्ठ! वह अपने आचरण की निन्दा करने लगा।
श्लोक 19: थोड़ी देर बाद उसे कुछ याद आया और उसने शिकारी से कहा - 'अच्छा, थोड़ी देर रुको। मैं तुम्हारी प्यास बुझा दूँगा।'॥19॥
श्लोक 20: ऐसा कहकर उसने पुनः सूखे पत्तों से अग्नि प्रज्वलित की और बड़े हर्ष में भरकर शिकारी से कहा-॥20॥
श्लोक 21: मैंने ऋषियों, देवताओं, पितरों और महात्माओं के मुख से सुना है कि अतिथि पूजन में महान पुण्य है।
श्लोक 22: सौम्य! अतः आज मैंने भी अतिथि की उत्तम पूजा करने का निश्चय किया है। कृपया मुझे स्वीकार करें और मुझ पर कृपा करें। मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ।'॥22॥
श्लोक 23: ऐसा कहकर और अतिथि पूजन की प्रतिज्ञा करके उस अत्यंत बुद्धिमान पक्षी ने अग्निदेव की तीन बार परिक्रमा की और हँसता हुआ अग्नि में प्रवेश कर गया॥ 23॥
श्लोक 24: पक्षी को आग के अंदर देखकर शिकारी को चिंता होने लगी, “मैंने क्या किया है?”
श्लोक 25: अरे! अपने कर्मों के कारण दण्डित हुए मुझ जैसे क्रूर शिकारी के जीवन में यह सबसे भयंकर और महान पाप होगा, इसमें संशय नहीं है॥25॥
श्लोक 26: कबूतर को ऐसी अवस्था में देखकर शिकारी ने बहुत विलाप किया, अपने कर्मों की निन्दा की और बहुत सी बातें कहीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥