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mahabharat 12.143.5: युधिष्ठिर ने पूछा - हे भरतपुत्र! प्राचीन काल में कबूतर किस प्रकार शरणागत शत्रु को अपना मांस खिलाता था और ऐसा करने से उसे क्या मोक्ष प्राप्त होता था?   |   mahabharat अध्याय 12.143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.143.5 
युधिष्ठिर उवाच
कथं कपोतेन पुरा शत्रु: शरणमागत:।
स्वमांसं भोजित: कां च गतिं लेभे स भारत॥ ५॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - हे भरतपुत्र! प्राचीन काल में कबूतर किस प्रकार शरणागत शत्रु को अपना मांस खिलाता था और ऐसा करने से उसे क्या मोक्ष प्राप्त होता था?
 
Yudhishthira asked - O son of Bharata! In ancient times how did a pigeon feed its flesh to an enemy who had taken refuge and what salvation did it receive by doing so? 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)