vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना
»
श्लोक 4
श्लोक
12.143.4
श्रूयते च कपोतेन शत्रु: शरणमागत:।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रित:॥ ४॥
अनुवाद
यह भी सुना जाता है कि एक कबूतर ने शरण मांगने आए शत्रु का यथोचित आतिथ्य किया था तथा उसे अपना मांस खाने के लिए आमंत्रित किया था।
It is also heard that a pigeon had given a befitting hospitality to the enemy who had come seeking refuge and had invited him to eat his flesh.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×