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mahabharat 12.143.33: ऐसा कहकर उसने भूमि पर पत्ते बिछा दिए और एक चट्टान पर सिर रखकर महान दुःख से घिरा हुआ वह शिकारी वहीं सो गया।   |   mahabharat अध्याय 12.143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.143.33 
स शिलायां शिर: कृत्वा पर्णान्यास्तीर्य भूतले।
दु:खेन महताऽऽविष्टस्तत: सुष्वाप पक्षिहा॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर उसने भूमि पर पत्ते बिछा दिए और एक चट्टान पर सिर रखकर महान दुःख से घिरा हुआ वह शिकारी वहीं सो गया।
 
Having said this he spread leaves on the ground and putting his head on a rock the hunter, surrounded by great sorrow, went to sleep there.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादोपक्रमे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कपोत और व्याधके संवादका उपक्रमविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)