श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  12.143.32-33h 
कृतबुद्धिर्द्रुमे तस्मिन् वस्तुं तां रजनीं तत:।
साञ्जलि: प्रणतिं कृत्वा वाक्यमाह वनस्पतिम्॥ ३२॥
शरणं यामि यान्यस्मिन् दैवतानि वनस्पतौ।
 
 
अनुवाद
इसके बाद उसने पूरी रात पेड़ के नीचे रहने का निश्चय किया। फिर उसने हाथ जोड़कर पौधे को प्रणाम किया और कहा, 'मैं इस पेड़ पर विराजमान सभी देवताओं की शरण में हूँ।'
 
After this he decided to stay under the tree for the whole night. Then he folded his hands and bowed down to the plant and said, 'I seek refuge in all the deities who are on this tree.' 32 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)