श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.143.2 
भीष्म उवाच
महान् धर्मो महाराज शरणागतपालने।
अर्ह: प्रष्टुं भवांश्चैव प्रश्नं भरतसत्तम॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - महाराज ! शरणागत की रक्षा करना महान धर्म है । भरतश्रेष्ठ ! ऐसा प्रश्न पूछने के अधिकारी आप ही हैं ॥2॥
 
Bhishmaji said – Maharaj! There is great dharma in protecting the surrendered. Bharatshrestha! You are the only one entitled to ask such a question. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)