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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 143: शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना
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श्लोक 16
श्लोक
12.143.16
एवं तु वर्तमानस्य तस्य वृत्तिं दुरात्मन:।
अगमत् सुमहान् कालो न चाधर्ममबुध्यत॥ १६॥
अनुवाद
यही उसका नित्य कर्म था। इस प्रकार रहते हुए उस दुष्टात्मा ने वहाँ बहुत समय बिताया, परन्तु उसे अपने पाप का ज्ञान न हुआ॥16॥
This was his daily work. Living in this manner the wicked soul spent a long time there, but he did not realise his sin.॥ 16॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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