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mahabharat 12.142.37: हे मनुष्यों के स्वामी! जो भाव और व्यवहार आप देवताओं के प्रति रखते हैं, वही भाव और व्यवहार आपको ब्राह्मणों के प्रति भी रखना चाहिए; क्योंकि क्रोध में भरे हुए ब्राह्मणों ने अनेक प्रकार के अद्भुत कर्म किए हैं ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 12.142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.142.37 
या देवतासु वृत्तिस्ते सास्तु विप्रेषु नित्यदा।
क्रुद्धैर्हि विप्रै: कर्माणि कृतानि बहुधा नृप॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जो भाव और व्यवहार आप देवताओं के प्रति रखते हैं, वही भाव और व्यवहार आपको ब्राह्मणों के प्रति भी रखना चाहिए; क्योंकि क्रोध में भरे हुए ब्राह्मणों ने अनेक प्रकार के अद्भुत कर्म किए हैं ॥37॥
 
O Lord of men! The same attitude and behaviour you show towards the gods should always be shown towards the brahmins as well; because the brahmins, filled with anger, have committed many types of amazing deeds. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)