श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.142.3 
भीष्म उवाच
नैतच्छ्रुत्वाऽऽगमादेव तव धर्मानुशासनम्।
प्रज्ञासमवहारोऽयं कविभि: सम्भृतं मधु॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, "बेटा! मैंने यह धर्म केवल शास्त्रों से सुनकर तुम्हारे लिए नहीं कहा है। जैसे मक्खियाँ विभिन्न स्थानों से नाना प्रकार के पुष्पों का रस एकत्रित करके मधु एकत्रित करती हैं, वैसे ही विद्वानों ने नाना प्रकार की बुद्धि (विचार) एकत्रित की हैं (ऐसी बुद्धि का उपयोग शायद संकटकाल में ही किया जा सकता है। यह हर समय उपयोग में लाने के लिए नहीं है; इसलिए तुम्हारे मन में किसी प्रकार की आसक्ति या शोक नहीं होना चाहिए)।
 
Bhishma said, "Son! I have not preached this Dharma for you merely by hearing it from the scriptures. Just as flies collect honey by collecting nectar of various kinds of flowers from various places, similarly learned men have collected various kinds of intellects (thoughts) (such intellects can perhaps be used in times of crisis. These are not meant to be used all the time; hence there should be no attachment or sorrow in your mind).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)