श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.142.24 
अनव्यवहितं यो वा नेदं वाक्यमुपाश्नुते।
उग्रायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे न त्वमीक्षसे॥ २४॥
 
 
अनुवाद
यदि तुम मेरी इस बुद्धिमतापूर्ण बात को स्वीकार नहीं करते, तो तुम्हारा आचरण उचित नहीं है; क्योंकि तुम (क्षत्रिय होकर) विधाता ने हिंसा करने के लिए ही उत्पन्न किए हो। तुम इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हो॥24॥
 
If you do not accept my wise statement, then your conduct is not proper; because you (being a Kshatriya) have been created by the Creator for violent acts only. You are not paying any attention to this. ॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)