श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.142.21 
आगतागमया बुद्धॺा वचनेन प्रशस्यते।
अज्ञानाज्ज्ञानहेतुत्वाद् वचनं साधु मन्यते॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वेद और शास्त्र जो कुछ कहते हैं और तर्क से समर्थित होते हैं, वही शास्त्रों की प्रशंसा है, अर्थात् शास्त्रों की वही बात लोगों के मन में बैठ जाती है। दूसरे लोग अज्ञात विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए तर्क को ही सर्वोत्तम उपाय समझते हैं, परन्तु यह उनकी मूर्खता है।॥21॥
 
Whatever is said by the Vedas and scriptures, and which is supported by logic, is what praises the scriptures, i.e., only that thing of the scriptures gets stuck in people's minds. Other people consider only logic to be the best way to gain knowledge of unknown subjects, but this is their foolishness. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)