श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 142: आपात‍्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.142.1 
युधिष्ठिर उवाच
यदि घोरं समुद्दिष्टमश्रद्धेयमिवानृतम्।
अस्ति स्विद् दस्युमर्यादा यामहं परिवर्जये॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - "यदि महापुरुषों के लिए भी (संकट के समय) ऐसा भयंकर कर्म कर्तव्य बताया गया है, तो दुष्ट लुटेरों और चोरों के बुरे कर्मों की क्या सीमा रह गई है, जिनसे मुझे सदैव दूर रहना चाहिए? (इससे अधिक भयंकर कर्म तो डाकू भी नहीं कर सकता।)"॥1॥
 
Yudhishthira asked, "If such a dreadful act has been prescribed as duty even for great men (in times of crisis), then what is the limit left for the evil deeds of wicked robbers and thieves, which I must always shun? (Even a bandit cannot commit a more dreadful act than this.)"॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)