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mahabharat 12.141.91: चाण्डाल बोला - जो विद्वान अनुचित स्थान से, अनुचित कर्म से तथा निन्दित व्यक्ति से कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उसका सदाचार उसे ऐसा करने से रोकता है (अतः ज्ञानी और धार्मिक आत्मा होने के कारण आप स्वयं ऐसे निन्दनीय कर्मों से दूर रहें); किन्तु जो बार-बार अत्यंत आग्रहपूर्वक कुत्ते का मांस खा रहा है, उसे भी उसका दण्ड भोगना चाहिए (इसमें मेरा कोई दोष नहीं है)॥91॥   |   mahabharat अध्याय 12.141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  12.141.91 
श्वपच उवाच
अस्थानतो हीनत: कुत्सिताद् वा
तद् विद्वांसं बाधते साधुवृत्तम्।
श्वानं पुनर्यो लभतेऽभिषङ्गात्
तेनापि दण्ड: सहितव्य एव॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
चाण्डाल बोला - जो विद्वान अनुचित स्थान से, अनुचित कर्म से तथा निन्दित व्यक्ति से कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उसका सदाचार उसे ऐसा करने से रोकता है (अतः ज्ञानी और धार्मिक आत्मा होने के कारण आप स्वयं ऐसे निन्दनीय कर्मों से दूर रहें); किन्तु जो बार-बार अत्यंत आग्रहपूर्वक कुत्ते का मांस खा रहा है, उसे भी उसका दण्ड भोगना चाहिए (इसमें मेरा कोई दोष नहीं है)॥91॥
 
Chandala said - The scholar who wants to take any forbidden thing from an inappropriate place, through inappropriate action and from a condemned person, his good conduct prevents him from doing so (therefore, being a knowledgeable and religious soul, you yourself should stay away from such condemnable actions); But the one who is repeatedly consuming dog's meat with utmost insistence should also bear its punishment (I have no fault in this). 91॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)