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mahabharat 12.141.51: भूख के कारण ही मुझे यह पापकर्म करने पर विवश होना पड़ा है । भूखा मनुष्य जो भोजन के लिए तरसता है, उसे कोई भी कार्य करने में लज्जा नहीं आती । भूख मुझे कलंकित कर रही है, इसलिए मैं इस कुत्ते की जाँघ ले लूँगा ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 12.141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.141.51 
क्षुधित: कलुषं यातो नास्ति ह्रीरशनार्थिन:।
क्षुच्च मां दूषयत्यत्र हरिष्यामि श्वजाघनीम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
भूख के कारण ही मुझे यह पापकर्म करने पर विवश होना पड़ा है । भूखा मनुष्य जो भोजन के लिए तरसता है, उसे कोई भी कार्य करने में लज्जा नहीं आती । भूख मुझे कलंकित कर रही है, इसलिए मैं इस कुत्ते की जाँघ ले लूँगा ॥ 51॥
 
‘I have been forced to commit this sinful act because of hunger. A hungry man who craves for food has no shame in doing anything. Hunger is defaming me, so I will take this dog's thigh. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)