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mahabharat 12.141.1-6: युधिष्ठिर ने पूछा- हे प्रजापति! भरतपुत्र! हे राजन! जब सब लोग धर्म का उल्लंघन करने के कारण उत्तम धर्म का क्षय होने लगता है, जब अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मान लिया जाता है, जब सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाती हैं, धर्म का निश्चय डगमगा जाता है, राजा हो या शत्रु, प्रजा को सताने लगते हैं, समस्त आश्रम अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, धर्म-कर्म नष्ट हो जाते हैं, काम, लोभ और मोह के कारण सबको सर्वत्र भय ही भय दिखाई देने लगता है, कोई किसी पर विश्वास नहीं करता, सब लोग सदैव भयभीत रहते हैं, लोग छल से एक-दूसरे को मारने लगते हैं, सब आपस में ही छल करने लगते हैं, देश में जगह-जगह आग लग जाती है, ब्राह्मण अत्यंत व्यथित हो जाते हैं, वर्षा नहीं होती, परस्पर द्वेष और फूट बढ़ जाती है और पृथ्वी पर जीविका के सभी साधन लुटेरों के वश में आ जाते हैं, तब ऐसे बुरे समय में ब्राह्मण किस उपाय से जीवित रहे?॥1-6॥   |   mahabharat अध्याय 12.141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 141: ‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद  »  श्लोक 1-6
 
 
श्लोक  12.141.1-6 
युधिष्ठिर उवाच
हीने परमके धर्मे सर्वलोकाभिलङ्घिते।
अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते॥ १॥
मर्यादासु विनष्टासु क्षुभिते धर्मनिश्चये।
राजभि: पीडिते लोके परैर्वापि विशाम्पते॥ २॥
सर्वाश्रमेषु मूढेषु कर्मसूपहतेषु च।
कामाल्लोभाच्च मोहाच्च भयं पश्यत्सु भारत॥ ३॥
अविश्वस्तेषु सर्वेषु नित्यं भीतेषु पार्थिव।
निकृत्या हन्यमानेषु वञ्चयत्सु परस्परम्॥ ४॥
सम्प्रदीप्तेषु देशेषु ब्राह्मणे चातिपीडिते।
अवर्षति च पर्जन्ये मिथो भेदे समुत्थिते॥ ५॥
सर्वस्मिन् दस्युसाद् भूते पृथिव्यामुपजीवने।
केनस्विद् ब्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- हे प्रजापति! भरतपुत्र! हे राजन! जब सब लोग धर्म का उल्लंघन करने के कारण उत्तम धर्म का क्षय होने लगता है, जब अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मान लिया जाता है, जब सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाती हैं, धर्म का निश्चय डगमगा जाता है, राजा हो या शत्रु, प्रजा को सताने लगते हैं, समस्त आश्रम अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, धर्म-कर्म नष्ट हो जाते हैं, काम, लोभ और मोह के कारण सबको सर्वत्र भय ही भय दिखाई देने लगता है, कोई किसी पर विश्वास नहीं करता, सब लोग सदैव भयभीत रहते हैं, लोग छल से एक-दूसरे को मारने लगते हैं, सब आपस में ही छल करने लगते हैं, देश में जगह-जगह आग लग जाती है, ब्राह्मण अत्यंत व्यथित हो जाते हैं, वर्षा नहीं होती, परस्पर द्वेष और फूट बढ़ जाती है और पृथ्वी पर जीविका के सभी साधन लुटेरों के वश में आ जाते हैं, तब ऐसे बुरे समय में ब्राह्मण किस उपाय से जीवित रहे?॥1-6॥
 
Yudhishthira asked- O Lord of the people! Son of Bharat! O King! When the best of Dharma starts to diminish due to violation of Dharma by all the people, when Adharma is accepted as Dharma and Dharma is considered as Adharma, when all the limits are destroyed, the determination of Dharma is shaken, the king or the enemy starts tormenting the people, all the ashrams become confused, Dharma-karma is destroyed, due to lust, greed and attachment, everyone starts seeing fear everywhere, no one trusts anyone, everyone remains always afraid, people start killing each other by deceit, everyone starts cheating among themselves, fires are set everywhere in the country, Brahmins become very distressed, there is no rain, mutual enmity and divisions increase and all the means of livelihood on earth come under the control of robbers, then in such a bad time, by what means should a Brahmin survive?॥1-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)