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mahabharat 12.140.8: जो सदैव दूसरों को दण्ड देने में तत्पर रहता है, उससे लोग बहुत डरते हैं; इसलिए उसे दण्ड के द्वारा ही समस्त प्राणियों को वश में करना चाहिए। 8.   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.140.8 
नित्यमुद्यतदण्डस्य भृशमुद्विजते नर:।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो सदैव दूसरों को दण्ड देने में तत्पर रहता है, उससे लोग बहुत डरते हैं; इसलिए उसे दण्ड के द्वारा ही समस्त प्राणियों को वश में करना चाहिए। 8.
 
'People are very afraid of the one who is always ready to punish others; therefore he should control all creatures through punishment only. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)