Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.140.70: शत्रु के प्रति मैंने जो पापपूर्ण व्यवहार बताया है, उसे संकटग्रस्त होने पर समर्थ पुरुष को कभी नहीं करना चाहिए। किन्तु जब शत्रु ऐसे व्यवहार से उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तब उसे प्रतिशोध के लिए इन उपायों का विचार क्यों नहीं करना चाहिए? इसीलिए मैंने तुम्हारे कल्याण की इच्छा से यह सब कुछ तुमसे कहा है॥ 70॥ | mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इतीदमुक्तं वृजिनाभिसंहितं
न चैतदेवं पुरुष: समाचरेत् ।
परप्रयुक्ते न कथं विभावये-
दतो मयोक्तं भवतो हितार्थिना॥ ७०॥
अनुवाद
शत्रु के प्रति मैंने जो पापपूर्ण व्यवहार बताया है, उसे संकटग्रस्त होने पर समर्थ पुरुष को कभी नहीं करना चाहिए। किन्तु जब शत्रु ऐसे व्यवहार से उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तब उसे प्रतिशोध के लिए इन उपायों का विचार क्यों नहीं करना चाहिए? इसीलिए मैंने तुम्हारे कल्याण की इच्छा से यह सब कुछ तुमसे कहा है॥ 70॥
'This sinful behaviour towards the enemy that I have preached should never be practiced by a capable person when he is in trouble. But when the enemy creates trouble for him by such behaviour, then why should he not think of using these measures to retaliate? That is why I have told you all this with the desire of your welfare.'॥ 70॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥