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mahabharat 12.140.59: यदि ऋण बढ़ता रहे, तिरस्कृत शत्रु बने रहें, तथा रोगों की उपेक्षा होती रहे, तो ये सभी बातें तीव्र भय को जन्म देती हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  12.140.59 
वर्धमानमृणं तिष्ठेत् परिभूताश्च शत्रव:।
जनयन्ति भयं तीव्रं व्याधयश्चाप्युपेक्षिता:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
यदि ऋण बढ़ता रहे, तिरस्कृत शत्रु बने रहें, तथा रोगों की उपेक्षा होती रहे, तो ये सभी बातें तीव्र भय को जन्म देती हैं।
 
If debts continue to mount, despised enemies continue to exist, and diseases remain neglected, all of these give rise to intense fear. 59.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)