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mahabharat 12.140.58: ऋण, अग्नि और शत्रुओं में से यदि कुछ भी शेष रह जाए तो वह बार-बार बढ़ता रहता है; अतः इनमें से कुछ भी शेष न रहे ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  12.140.58 
ऋणशेषमग्निशेषं शत्रुशेषं तथैव च।
पुन: पुन: प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न धारयेत्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
ऋण, अग्नि और शत्रुओं में से यदि कुछ भी शेष रह जाए तो वह बार-बार बढ़ता रहता है; अतः इनमें से कुछ भी शेष न रहे ॥58॥
 
If any of debt, fire and enemies is left over, it keeps on increasing again and again; therefore none of these should be left over. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)