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mahabharat 12.140.57: धर्म, अर्थ और काम - इन तीन प्रकार के मानवीय प्रयासों में तीन प्रकार की बाधाएँ आती हैं - लोभ, मूढ़ता और दुर्बलता। इसी प्रकार तीन प्रकार के फल भी होते हैं - शांति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग। इन (तीनों प्रकार के) फलों को शुभ समझना चाहिए; किन्तु (इन तीन प्रकार की) बाधाओं से बड़ी सावधानी से बचना चाहिए। ॥57॥   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.140.57 
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडानुबन्धास्त्रय एव च।
अनुबन्धा: शुभा ज्ञेया: पीडाश्च परिवर्जयेत्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
धर्म, अर्थ और काम - इन तीन प्रकार के मानवीय प्रयासों में तीन प्रकार की बाधाएँ आती हैं - लोभ, मूढ़ता और दुर्बलता। इसी प्रकार तीन प्रकार के फल भी होते हैं - शांति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग। इन (तीनों प्रकार के) फलों को शुभ समझना चाहिए; किन्तु (इन तीन प्रकार की) बाधाओं से बड़ी सावधानी से बचना चाहिए। ॥57॥
 
In the pursuit of the three types of human endeavours - Dharma, Artha and Kama - there are three types of obstacles - greed, stupidity and weakness. Similarly, there are three types of results - peace, actions beneficial to all and consumption. These (three types of) results should be considered auspicious; but (these three types of) obstacles should be avoided with great care. ॥57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)