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mahabharat 12.140.5: अप्राप्त वस्तु कैसे प्राप्त की जा सकती है? अर्जित धन को कैसे बढ़ाया जा सकता है? बढ़े हुए धन की रक्षा कैसे की जा सकती है? और उस संरक्षित धन का सदुपयोग कैसे किया जाना चाहिए?'॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.140.5 
अलब्धस्य कथं लिप्सा लब्धं केन विवर्धते।
वर्धितं पाल्यते केन पालितं प्रणयेत् कथम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अप्राप्त वस्तु कैसे प्राप्त की जा सकती है? अर्जित धन को कैसे बढ़ाया जा सकता है? बढ़े हुए धन की रक्षा कैसे की जा सकती है? और उस संरक्षित धन का सदुपयोग कैसे किया जाना चाहिए?'॥5॥
 
‘How can the unobtained object be obtained? How can the acquired wealth be increased? How can the increased wealth be protected? And how should that protected wealth be utilized properly?’॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)