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mahabharat 12.140.48: यदि गुरु अहंकार से युक्त होकर उचित-अनुचित का बोध न करके कुमार्ग पर चला जाए, तो उसे भी दण्ड देना उचित है; दण्ड उसे सही मार्ग पर लाता है॥ 48॥   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.140.48 
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत:।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य दण्डो भवति शासनम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
यदि गुरु अहंकार से युक्त होकर उचित-अनुचित का बोध न करके कुमार्ग पर चला जाए, तो उसे भी दण्ड देना उचित है; दण्ड उसे सही मार्ग पर लाता है॥ 48॥
 
‘If the Guru, being full of arrogance, does not understand what is right and what is wrong and goes on the wrong path, then it is appropriate to punish him as well; punishment brings him on the right track.॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)