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mahabharat 12.140.36: जिस सुख का समय आ गया है उसे त्याग देना और भविष्य में मिलने वाले सुख की आशा करना बुद्धिमानों की नीति नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.140.36 
प्रत्युपस्थितकालस्य सुखस्य परिवर्जनम्।
अनागतसुखाशा च नैव बुद्धिमतां नय:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जिस सुख का समय आ गया है उसे त्याग देना और भविष्य में मिलने वाले सुख की आशा करना बुद्धिमानों की नीति नहीं है।
 
'To give up a pleasure whose time has come and to hope for happiness which will be available in the future is not the policy of the wise.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)