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mahabharat 12.140.34: जहाँ प्राण संकट में हों, वहाँ कष्ट सहे बिना मनुष्य कल्याण नहीं देख सकता। प्राण संकट में बच जाने पर उसे अपना कल्याण दिखाई देता है॥ 34॥   |   mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.140.34 
न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति।
संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जहाँ प्राण संकट में हों, वहाँ कष्ट सहे बिना मनुष्य कल्याण नहीं देख सकता। प्राण संकट में बच जाने पर उसे अपना कल्याण दिखाई देता है॥ 34॥
 
'A man cannot see welfare without accepting such suffering where his life is in danger. If he survives a life-threatening situation, he sees his own good.॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)