Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.140.15: शत्रु का मित्र बनो और उसे मीठे वचनों से सान्त्वना देते रहो; किन्तु जिस प्रकार मनुष्य साँपों से भरे घर से डरता है, उसी प्रकार उसे उस शत्रु के प्रति भी सदैव चिन्तित रहना चाहिए। | mahabharat अध्याय 12.140: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
शत्रुं च मित्ररूपेण सान्त्वेनैवाभिसान्त्वयेत्।
नित्यशश्चोद्विजेत् तस्माद् गृहात् सर्पयुतादिव॥ १५॥
अनुवाद
शत्रु का मित्र बनो और उसे मीठे वचनों से सान्त्वना देते रहो; किन्तु जिस प्रकार मनुष्य साँपों से भरे घर से डरता है, उसी प्रकार उसे उस शत्रु के प्रति भी सदैव चिन्तित रहना चाहिए।
'Become a friend of the enemy and keep consoling him with sweet words; but just as a man is afraid of a house infested with snakes, in the same way he should always be anxious about that enemy as well.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥