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mahabharat 12.139.44: इस संसार में जिसने शत्रुता कर ली है, उस मित्र पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि जैसे लकड़ी के भीतर अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही उसके हृदय में शत्रुता छिपी रहती है ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.139: शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.139.44 
कृतवैरे न विश्वास: कार्यस्त्विह सुहृद्यपि।
छन्नं संतिष्ठते वैरं गूढोऽग्निरिव दारुषु॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जिसने शत्रुता कर ली है, उस मित्र पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि जैसे लकड़ी के भीतर अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही उसके हृदय में शत्रुता छिपी रहती है ॥ 44॥
 
One should not trust even a friend who has developed enmity in this world, because just like fire is hidden inside wood, similarly enmity is hidden in his heart. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)