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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान
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श्लोक 58
श्लोक
12.138.58
त्वमाश्रितो द्रुमस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रित:।
चिरोषितावुभावावां वृक्षेऽस्मिन् विदितं च ते॥ ५८॥
अनुवाद
‘तुम इस वृक्ष के ऊपर रहते हो और मैं इसकी जड़ों में रहता हूँ। इस प्रकार हम दोनों बहुत समय से इस वृक्ष की शरण में हैं, यह बात तुम्हें ज्ञात है।’ 58.
‘You live on top of this tree and I live at its roots. Thus we both have been taking shelter of this tree for a long time, this is known to you. 58.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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