श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 47-48h
 
 
श्लोक  12.138.47-48h 
हन्तास्मै सम्प्रवक्ष्यामि हेतुमात्माभिरक्षणे॥ ४७॥
अपीदानीमयं शत्रु: सङ्गत्या पण्डितो भवेत्।
 
 
अनुवाद
अच्छा, अब मैं उसे आत्मरक्षा का उपाय बताता हूँ। सम्भव है कि इस समय मेरी संगति से यह शत्रु विद्वान् हो जाए - उसे अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए।॥47 1/2॥
 
'Okay, now I am telling him a method for self-defense. It is possible that this enemy may become learned by my company at this time - he should use his discretion.'॥ 47 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)