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mahabharat 12.138.46-47h: विद्वान शत्रु भी अच्छा होता है, पर मूर्ख मित्र अच्छा नहीं होता। आज मेरा जीवन मेरे शत्रु बिल्ली के वश में है।   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 46-47h
 
 
श्लोक  12.138.46-47h 
श्रेष्ठो हि पण्डित: शत्रुर्न च मित्रमपण्डित:॥ ४६॥
मम त्वमित्रे मार्जारे जीवितं सम्प्रतिष्ठितम्।
 
 
अनुवाद
विद्वान शत्रु भी अच्छा होता है, पर मूर्ख मित्र अच्छा नहीं होता। आज मेरा जीवन मेरे शत्रु बिल्ली के वश में है।
 
‘A learned enemy is also good but a foolish friend is not good. Today my life is under the control of my enemy, the cat. 46 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)