श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  12.138.45-46h 
कदाचिद् व्यसनं प्राप्य संधिं कुर्यान्मया सह।
बलिना संनिकृष्टस्य शत्रोरपि परिग्रह:॥ ४५॥
कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना।
 
 
अनुवाद
यह संभव है कि संकट में पड़कर वह मुझसे संधि कर ले। आचार्य कहते हैं कि संकट आने पर प्राण बचाने की इच्छा रखने वाले बलवान पुरुष को भी अपने निकटतम शत्रु से संधि कर लेनी चाहिए। ॥45 1/2॥
 
‘It is possible that being in trouble he may make peace with me. The Acharyas say that in case of danger even a strong man who wants to save his life should make peace with his nearest enemy. ॥ 45 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)