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mahabharat 12.138.44: इसमें कोई संदेह नहीं कि बिल्ली मेरी सबसे बड़ी शत्रु है, तथापि इस समय वह बड़े संकट में है। यदि सम्भव हो तो मैं इस मूर्ख को संगति के द्वारा अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए राजी कर लूँ ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.138.44 
अयमत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गत:।
मूढो ग्राहयितुं स्वार्थं सङ्गत्या यदि शक्यते॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि बिल्ली मेरी सबसे बड़ी शत्रु है, तथापि इस समय वह बड़े संकट में है। यदि सम्भव हो तो मैं इस मूर्ख को संगति के द्वारा अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए राजी कर लूँ ॥ 44॥
 
'There is no doubt that the cat is my greatest enemy, however, at this moment he is in great trouble. If possible, I should persuade this fool to fulfill his selfish motives through company. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)