श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  12.138.23-24 
तत्र चागत्य चाण्डालो ह्यरण्ये कृतकेतन:।
प्रयोजयति चोन्माथं नित्यमस्तंगते रवौ॥ २३॥
तत्र स्नायुमयान् पाशान्यथावत् संविधाय स:।
गृहं गत्वा सुखं शेते प्रभातामेति शर्वरीम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उसी वन में एक चाण्डाल भी घर बनाकर रहता था। वह प्रतिदिन सायंकाल को सूर्य अस्त होने के पश्चात् वहाँ आकर अपना जाल फैलाता और जाल की डोरियों को यथास्थान लगाकर घर जाकर सुखपूर्वक सो जाता; फिर प्रातःकाल पुनः वहाँ आता।॥23-24॥
 
A Chandala also lived in the same forest by building a house. Every evening after the sun had set he would come there and spread his net and after fixing the strings of the net in their proper place he would go home and sleep peacefully; then he would come there again in the morning.॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)