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mahabharat 12.138.221: भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिल्ली का यह सुन्दर उपाख्यान संधि और विग्रह का ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करने वाला है। भूस्वामी को चाहिए कि इसे सदैव ध्यान में रखे और शत्रु के साथ भी उचित व्यवहार करे। 221॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 221
 
 
श्लोक  12.138.221 
द्वयोरिमं भारत संधिविग्रहं
सुभाषितं बुुद्धिविशेषकारकम्।
यथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा
निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले॥ २२१॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिल्ली का यह सुन्दर उपाख्यान संधि और विग्रह का ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करने वाला है। भूस्वामी को चाहिए कि इसे सदैव ध्यान में रखे और शत्रु के साथ भी उचित व्यवहार करे। 221॥
 
Bharatnandan! Nareshwar! This beautiful anecdote about the rat and the cat gives rise to the knowledge of Sandhi and Vigraha and special intelligence. The landowner should always keep this in mind and behave appropriately with the enemy. 221॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि मार्जारमूषिकसंवादे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें चूहे और बिलावका संवादविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)