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mahabharat 12.138.218-219h: हे प्रभु! हे मनुष्यों के स्वामी! ये ब्राह्मण धर्म के ज्ञाता होने के साथ-साथ सदैव कृतज्ञ भी रहते हैं। इनका आदर करने पर ये शुभ और कल्याणकारी होते हैं; अतः इनका सदैव आदर करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 218-219h
 
 
श्लोक  12.138.218-219h 
एते धर्मस्य वेत्तार: कृतज्ञा: सततं प्रभो॥ २१८॥
पूजिता: शुभकर्तार: पूजयेत् तान् नराधिप।
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे मनुष्यों के स्वामी! ये ब्राह्मण धर्म के ज्ञाता होने के साथ-साथ सदैव कृतज्ञ भी रहते हैं। इनका आदर करने पर ये शुभ और कल्याणकारी होते हैं; अतः इनका सदैव आदर करना चाहिए।
 
Lord! O Lord of men! These Brahmins, besides being knowledgeable about religion, are always grateful. When honoured, they are auspicious and well-wishers; hence they should always be honoured. 218 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)