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mahabharat 12.138.216-217h: पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और काम के अनुकूल है। आपको इसका आश्रय लेना चाहिए। मुझसे सुनी इस सलाह के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करने में तत्पर रहना चाहिए और समस्त प्रजा की रक्षा करते हुए अपनी उन्नति के लिए तत्पर रहना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.138.216-217h 
अविरुद्धां त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते॥ २१६॥
अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद् भूय: संरक्षयन् प्रजा:।
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और काम के अनुकूल है। आपको इसका आश्रय लेना चाहिए। मुझसे सुनी इस सलाह के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करने में तत्पर रहना चाहिए और समस्त प्रजा की रक्षा करते हुए अपनी उन्नति के लिए तत्पर रहना चाहिए।
 
Prithvinath! This policy is in accordance with Dharma, Artha and Kama. You should take shelter of it. Be ready to perform your duties as per this advice you have heard from me and stand up for your progress while protecting the entire public.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)