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mahabharat 12.138.215-216h: यदि तुम्हारे और तुम्हारे शत्रु के उद्देश्य एक ही हों, तो तुम्हें किसी बलवान शत्रु के साथ संधि करके उसके साथ मिलकर चतुराई से अपना कार्य पूरा करना चाहिए और एक बार अपना कार्य पूरा हो जाने पर फिर कभी उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए ॥215॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 215-216h
 
 
श्लोक  12.138.215-216h 
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा॥ २१५॥
समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत्।
 
 
अनुवाद
यदि तुम्हारे और तुम्हारे शत्रु के उद्देश्य एक ही हों, तो तुम्हें किसी बलवान शत्रु के साथ संधि करके उसके साथ मिलकर चतुराई से अपना कार्य पूरा करना चाहिए और एक बार अपना कार्य पूरा हो जाने पर फिर कभी उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए ॥215॥
 
If your and your enemy's purposes are the same, then you should enter into an agreement with a strong enemy and accomplish your task tactfully by meeting him, and once your task is accomplished, never trust him again. ॥ 215॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)