श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 214-215h
 
 
श्लोक  12.138.214-215h 
उपलभ्य मतिं चाग्रॺामरिमित्रान्तरं तथा॥ २१४॥
संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायस्तथैव च।
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ बुद्धि का आश्रय लेकर शत्रु और मित्र का भेद, संधि और वियोग के अवसर तथा विपत्ति से बचने के उपाय का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । 214 1/2॥
 
By taking the help of superior intellect, one should acquire knowledge about the differences between enemy and friend, the opportunities for alliance and separation and the means to escape from the calamity. 214 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)