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mahabharat 12.138.211-212h: जो व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान समझता है और निर्भय होकर घूमता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिए क्योंकि वह दूसरों की सलाह नहीं सुनता। भय को न जानने से उसे जानना बेहतर है क्योंकि वह उससे बचने का उपाय जानने के लिए उन लोगों के पास जाता है जो उसके परिणाम देख सकते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 211-212h
 
 
श्लोक  12.138.211-212h 
अभीश्चरति यो नित्यं मन्त्रोऽदेय: कथंचन॥ २११॥
अविज्ञानाद्धि विज्ञातो गच्छेदास्पददर्शिषु।
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान समझता है और निर्भय होकर घूमता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिए क्योंकि वह दूसरों की सलाह नहीं सुनता। भय को न जानने से उसे जानना बेहतर है क्योंकि वह उससे बचने का उपाय जानने के लिए उन लोगों के पास जाता है जो उसके परिणाम देख सकते हैं।
 
One who considers himself wise and moves about fearlessly should never be given any advice because he does not listen to the advice of others. It is better to know fear than not to know it because he goes to the people who can see the consequences in order to know the remedy to escape it. 211 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)