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mahabharat 12.138.2-3: हे भारतभूषण! अतः अब मैं आपसे उस परम ज्ञान के विषय में सुनना चाहता हूँ, जिसका आश्रय लेकर धर्म और अर्थशास्त्र में पारंगत तथा धर्मशास्त्र में पारंगत राजा शत्रुओं से घिरे होने पर भी भ्रमित नहीं होता। हे कुरुश्रेष्ठ! मैं आपसे उस ज्ञान के विषय में पूछ रहा हूँ; अतः आप कृपा करके उसे मुझे समझाएँ॥2-3॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.138.2-3 
तदिच्छामि परां श्रोतुं बुद्धिं ते भरतर्षभ।
यथा राजा न मुह्येत शत्रुभि: परिवारित:॥ २॥
धर्मार्थकुशलो राजा धर्मशास्त्रविशारद:।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे भारतभूषण! अतः अब मैं आपसे उस परम ज्ञान के विषय में सुनना चाहता हूँ, जिसका आश्रय लेकर धर्म और अर्थशास्त्र में पारंगत तथा धर्मशास्त्र में पारंगत राजा शत्रुओं से घिरे होने पर भी भ्रमित नहीं होता। हे कुरुश्रेष्ठ! मैं आपसे उस ज्ञान के विषय में पूछ रहा हूँ; अतः आप कृपा करके उसे मुझे समझाएँ॥2-3॥
 
O Bharat Bhushan! Therefore, now I wish to hear from you about that supreme wisdom, by resorting to which a king who is well versed in Dharma and Arthashastra and is well versed in theology, does not get confused even when surrounded by enemies. O best of the Kurus! I am asking you about that wisdom; therefore, please explain it to me.॥2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)