श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 193-194h
 
 
श्लोक  12.138.193-194h 
अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निबोधोशनसा कृते।
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा॥ १९३॥
समाहितश्चरेद् युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत्।
 
 
अनुवाद
‘इस विषय पर शुक्राचार्य ने दो श्लोक कहे हैं। उन्हें ध्यानपूर्वक सुनो। जब तुम और तुम्हारे शत्रु एक ही समस्या से जूझ रहे हों, तब दुर्बल को बलवान शत्रु से हाथ मिलाकर बड़ी सावधानी और चतुराई से उसका काम निकलवाना चाहिए और जब काम निकल जाए, तब शत्रु पर भरोसा नहीं करना चाहिए (यह पहला श्लोक है)’॥193 1/2॥
 
‘Sukracharya has said two verses on this subject. Listen to them carefully. When you and your enemy are facing the same problem, then the weak should join hands with the strong enemy and get his work done with great caution and tact and when the work is done, then he should not trust the enemy (this is the first verse)’॥193 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)