श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 191-192
 
 
श्लोक  12.138.191-192 
साधुर्भवान् श्रुतार्थोऽस्मि प्रीये च न च विश्वसे॥ १९१॥
संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्य: पुनस्त्वया।
न ह्यमित्रे वशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे॥ १९२॥
 
 
अनुवाद
भाई! आप सचमुच महान संत हैं। मैंने आपके विषय में यह सुना है। मैं इससे प्रसन्न हूँ; परन्तु मैं आप पर विश्वास नहीं कर सकता। आप मेरी कितनी ही प्रशंसा करें। आप मेरे लिए कितना ही धन व्यय करें; परन्तु अब मैं आपके साथ नहीं जा सकता। मित्र! बुद्धिमान और विद्वान् पुरुष बिना किसी विशेष कारण के अपने शत्रुओं के हाथ में नहीं पड़ते।॥191-192॥
 
‘Brother! You are indeed a great saint. I have heard this about you. I am happy with it; but I cannot trust you. No matter how much you praise me. No matter how much money you spend for me; but now I cannot join you. Friend! Wise and learned men do not fall into the hands of their enemies without any special reason.॥ 191-192॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)