श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 180-181h
 
 
श्लोक  12.138.180-181h 
न त्वात्मन: सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते॥ १८०॥
आत्मा हि सर्वदा रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि।
 
 
अनुवाद
‘धन और रत्नों के समान अपने को शत्रु के हाथ में देना वांछनीय नहीं है। धन और स्त्रियों के द्वारा अर्थात् उनका त्याग करके ही अपनी रक्षा करनी चाहिए।॥180 1/2॥
 
‘It is not desirable to give yourself into the hands of the enemy like wealth and gems. One should always protect oneself through wealth and women, i.e. by abandoning them.॥ 180 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)